Monday, October 10, 2016

हाँ ! मैं हूँ रावण ।

विजयादशमी की बधाईयां लिजिए - दिजिए । लंका से लुटे सोने के प्रतीक स्वरूप सोन पत्ती का आदान प्रदान किजिए क्योंकि इस तिथी में आज से हजारों साल पहले साधारण मनुष्यों की तुलना मे दस गुना ज्यादा बुद्धि के स्वामी दशानन को अयोध्या नरेश दशरथ के ज्योष्ठ पुत्र श्रीराम नें देह से मुक्ति प्रदान किरके संपूर्ण पृथ्वी ही नही तीनों लोकों पर फैले रावण के प्रभाव को खत्म करने का कार्य किये थे । वह दशानन जिसनें संपूर्म त्रैलोक्य मे अपना प्रभाव जमा रखा रखा था , जिसके प्रभाव के कारण ब्रह्मांण मे कोई भी उसके सामने नही ठहर सकता था राजा बाली सहित संपूर्ण बलशाली योद्धा उसके मित्र थे । रावण स्वयं मनुष्य था और उसने देवताओं से मानवों की रक्षा करने के लिए जिन नीतीयों को बनाया उन्हे रक्ष कहा गया । रक्ष  संस्कृति की स्थापना रावण ने ही किए थे । अब आप सोचेंगे कि देवताओं से मनुष्यों की रक्षा कैसे ?
                                            हम मानव किसके भरोसे काम करते हैं .. किसे मानते हैं .. हम मानते हैं भगवान को जो दवताओं का ही रूप समझा जाता है । रावणराज नें मनुष्यों को यह समझाने का प्रयत्न किए थे कि इस पृथ्वी का संचालन देवता नही करते । देव, मानव, यक्ष, नाग, गंधर्व सहित अन्य सभी लोकवासीयों को पूरी स्वतंत्रता है कि वह  अपनी इच्छानुसार कार्य करे ऐसे कार्य जिससे परमात्मा के द्वारा निर्मित प्राणी स्वच्छंदता से जीवन व्यतीत करें किंतु परमात्मा का ध्यान रखते हुए हमेशा ऐसे कार्य करें जिससे दुसरे प्राणीयों को कष्ट ना हो किंतु देवताओं को घमंड रहता है इस बात का कि मनुष्यों को मिलनी वाली हर चीज चाहे वह वायु हो या जल उसे देवताओं के द्वारा ही उपलब्ध कराया जाता है , पांचो तत्वो की उपलब्धता पृथ्वीलोक में सुनिश्चित करने का कार्य देवताओं   परमात्मा ने देवताओं को प्रदान किए है ।  इसके बदले परमात्मा ने उन्हे स्वर्ग लोक दे रखे हैं जहाँ उन्हे किसी भी चीज की कमी नही है किंतु कुछ ऋषियों द्वारा पृथ्वी के राजाओं के लिए अधिक शक्ति व संपन्नता के लिए देवताओं की ही पूजा की जाने लगी जिससे मनुष्य और परमात्मा के बीच का सीधा तारतम्य टूट गया । अब मनुष्य अपने सहस्त्रार से सीधे परमात्मा को ना पाकर देवताओं का मानसिक पूजन करना शुरू कर दिया । देवताओं को मनुष्य ने भोजन और यज्ञ की आहूति देना प्रारंभ कर दिया जिससे देवताओं की अपेक्षाएं बढने लगी । देवराज इंद्र ने तो कई बार अपनी हदें पार करके नीचतापूर्ण कार्य करने लगा था ( अहिल्या, विश्वामित्र का तप भंग जैसे ) जिसके बाद से पृथ्वी पर इंद्र की पूजा निषेध कर दी गई  ।
                                          मनुष्यों के द्वारा दी जाने वाली यज्ञ आहूतियों के माध्यम से देवता मदिरा और बलि मे मांस भी पाना शुरू कर दिए थे और जो भी मनुष्य उन्हे नही पूजता था या यज्ञ आहूति नही देता था उसे कष्ट देते थे । लेकिन लंकाधिपति रावण नें सीधे शिव को अपना गुरू बनाने की सोचे और देवताओं द्वारा उत्पन्न तमाम अवरोधों को पार करके स्वयं के लिए अमरता प्राप्त कर लिया । रावण पहले ऐसे मानव बन गए जो देवताओं की पूजा ना करके उन्हे उनके कार्य अपनी शक्तियों के प्रभाव से करवाते थे । देवता उनसे भयभीत रहते थे क्योंकि उनकी अराध्य शिव स्वयं उन्हे वह सभी शक्तियां दे चूके थे जिससे वह देवताओं सहित सभी लोकों पर अपना प्रभाव जमा ले । रावण नें कभी भी किसी भी मानव पर कोई अत्याचार किया हो इसका उल्लेख कहीं नही है । वह मनुष्यों को अपनी स्वयं की शक्तियों को पहचानने की बात कहते और करते थे ।
                            रामायण लगभग हर कोई पढ चूका है और रावण को भी जानता है लेकिन कुछ अनुत्तरित प्रश्न आज भी हैं जो रावण की महानता को नजरअंदाज करने की मानव की भूल दर्शाते हैं । जैसे -
1. यदि रावण इतना शक्तिशाली था जो देवताओं को भी पराजित कर सकता था तो भी उसने लंका के अलावा और किसी भी दुसरे राज्यों को क्यों नही अपने आधिपत्य में किया 2. वह दुसरे राज्योंं को जीतने के बजाय मित्रतापूर्ण संबंधोंं को  प्राथमिकता क्यों देता था
3. अकेली स्त्री सूर्पनखा के नाक कान काट कर लक्ष्मण के कायराना वार के बदले यदि रावण नें सर्जिकल स्ट्राइक करके सीता हरण किया तो क्या गलत था ?
4. अयोध्या नरेश दशरथ सहित उस समय कई राजाओं की एक से ज्यादा पत्नियां होती थी किंतु रावण की मंदोदरी के अलावा अन्य किसी पत्नि का उल्लेख नही है ।
5. रावण को घमंडी कहा जाता है जबकि रामेश्वरम् में स्थित रेत के शिवलिंग की स्थापना रावण नें ही करे थे वो भी श्रीराम के युद्ध जीतने के लिए वरदान पाने के लिए । यदि उन्हे घमंड होता तो वह अपने शत्रु के बुलावे पर अपनी ही मृत्यु का प्रबंध करने क्यों जाते ?
                                          इसके अलावा और भी कई सवाल हैं जिनके जवाब मे यह  मिलता है कि रावण एक महान
परोपकारी - अपने राज्य की जनता को हमेशा धन धान्य से भरपूर रखा ।
धैर्यवान - अपनी बहन के अपमान के बदले वह सेना लेकर नही गया बल्कि धैर्य के साथ योजना बना कर कार्य किया ।
 धर्मरक्षक - अपने पुरोहित धर्म को निभाने के लिए श्रीराम के बुलावे पर रामेश्वरम् पहुंचे
 संगीतप्रेमी - संगीत के क्षेत्र मे उल्लेखनीय कार्य जिसमे सरोद ( वीणा) का निर्माण
राजनीतिक - किसी से भी शत्रुता ना रख कर केवल मित्रता पर ज्यादा भरोसा रखा ।
 लेखक - शिव तंत्र, रावण संहिता जैसी अनमोल कृति मानव को मिली ।
 वैज्ञानिक - पुष्पक विमान के साथ साथ कई तरह के नवीन अस्त्र शस्त्रों का निर्माण किए
 समाजवादी - अपने परिवार के साथ पूरे राज्य मे केवल एक रक्ष समाज की स्थापना किए ।    
अहिंसक - जी हां , रावण ने कभी भी किसी की भी हत्या की हो इसका भी कोई प्रमाण फिलहाल  नही है ।  
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यह मेरे स्वयं के विचार है यदि आप लोगों को यह लगता हो कि मेरे द्वारा कही गई किसी बात मे विरोधाभास है तो कृपया मुझे सुधार हेतू सूचित करने का कष्ट करें ।
जय श्रीराम, जय रावण