Thursday, April 19, 2012

मत पूजो भगवान को ।

                                      अखण्ड मंडलाकारम् व्याप्तम् येन चराचरम् ।
                                 तद् पदम दर्शितम् येन , तस्स्स्मै श्री गुरूवे नमः ।।

                                 इसके अर्थ बताने का मेरे पास समय नही है । इसके अर्थ बताने के लिये कई लोग आ जाएंगे लेकिन मैं किसी अर्थ अर्थ में ना पडते हुए केवल यह बताना चाहता हूँ की इसका केवल एक ही अर्थ है - सब कुछ छोड कर केवल गुरू की शरण में आ जाओ । अब यहां मैं स्पष्ट कर दूं की गुरू का अर्थ आसाराम बापू, सुंधांशु महाराज, रामदेव बाबा, निर्मल बाबा  वगैरह वगैरह लोगों से कदापि नही है । दरअसल जिस समय इसकी रचना हुई उस समय किसी को नही पता था की आगे चलकर उनकी पीढी इस कदर गुरूओं का भेद तैय्यार करेगी की माता पिता भी गुरू कहलानें लगेंगे । इसमें मैं यह देखता हूँ की पहले के गुरू का अर्थ आज के उन सदगुरूओं की तरह है जो समाज से हट कर परंपराओं को तोडकर ऐसे  पुरूष बनाते थे जो मानव कल्याण के लिये अपना सारा जीवन आहूत कर देते थे । 

                                    जय श्रीराम.....दशरथ पुत्र राजकुमार राम को श्री राम और फिर मर्यादापुरूषोत्तम राम बनाने के लिये सदगुरू विश्वामित्र नें क्या कुछ नही किये । और विश्वमित्र नें जो कहे उसका निःसंकोच बिना प्रति प्रश्न पुछे श्री राम नें किस तरह से पालन किये होंगे यह समझना दुरूह है । आज जय जय श्रीराम के नारे लगाने वालों में से कितने लोग श्री राम के पद चिन्हों पर चले हैं या चल सकते हैं । राम नें गुरू की आज्ञा के बिना कोई कदम नही उठाये और हर जगह उन्हे बचाने वाले सदगुरू विश्वामित्र ही थे अन्यथा राज भवन से सीधे जंगल में जाना किसी के लिये भी आसान नही था । सीता माता नें अपने पति राम का साथ देकर पत्नि धर्म का वचन निभाए तो राम नें उस की बहुपत्निक रिमत पूजो ती को तोडकर एकल पत्नि प्रथा की शुरूआत किये । लक्ष्मण नें अपने भाई के प्रति समर्पण का भाव रखे और गुरू आज्ञा से आखिरी समय तक अपने भाई का साथ नही छोडे । श्रीराम में  सनातन धर्म का नियम है ।
                                         राधे राधे... वाह इनकी जोडी बिल्कुल राधा कृष्ण की तरह लग रही है .... वगैरह वगैरह कितने ही बार कहा जाता है राधा कृष्ण ... किसी नें यह सोचने की जहमत उठाए की जब कृष्ण की पत्नि रूक्मणी थीं तो ये राधा का चरित्र  कृष्ण के जीवन में कैसे आया दरअसल यह पश्चिमी सभ्यता का हिंदु धर्म में प्रवेश माना जा सकता है  मैं पुछना चाहता हूँ उन महिलाओं से जो राधा कृष्ण को बडे सुंदर ढंग से सजाती हैं तो कभी सोचीं की माता रूक्मणी के मन में क्या बीतती होगी । वह कृष्ण जिन्होनें रूक्मणी का भरे मण्डप में उस समय हरण कर लिये जबकि उनका विवाह शिशुपाल से तय किया जा चुका था और वेदी तैय्यार थी । जब कृष्ण नें रूक्मणी का हरण करके विवाह किये तो आज हम कृष्ण की मूर्ति पूजा करने वाले किस आधार पर एक तथाकथित प्रेमिका के रूप में राधा को पूज रहे हैं यदि उन पूजक महिलाओं को पता चले की उनके पति की एक प्रेमिका है तो वे अपने उस प्यारे प्राणपति के प्राण निकाल लेंगी तो फिर क्यों वे लोग रूक्मणी के स्थान पर राधा को पूज रहे हैं । श्री कृष्ण में सनातन धर्म का कर्म है ।
                                         
                                          बुद्धं शरणम् गच्छामि..... बोलने में कितना अच्छा लगता है धर्मम् शरणम् गच्छामि अहहा सुनकर मानो हममें पूरा धर्म समाहित हो जाता है । आज बुद्ध को मानने वाले दुनिया में सबसे ज्यादा है लेकिन एक बात कोई नही पुछा की बुद्ध .. जो गौतम गोत्र में उत्पन् हुए  और सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध बनने में 35 वर्ष का सफर तय किये उन्हे क्या हुआ था जो राजपाट, पत्नि-पुत्र को आधी रात को छोडकर सत्य की तलाश में चले गये... और सत्य भी कैसा .. जिसे ना कोई देखा ना समझा ..बस अनंत सत्य की तलाश में औऱ जब उन्हे वह ज्ञान मिल गया जिससे उन्होने हर सत्य को पहचान लिये तो उन्होने मूर्ति पूजा का विरोध किया जिस पर उन्हे पत्थर तक मारे गये लेकिन उन्होने स्वयं को बुद्ध बना ही लिये । जब बुद्ध नही रहे तो उनके हजारों- लाखों अनुयायी बनते चले गये पूरे विश्व में उस बुद्ध की मूर्तियां करोडों की संख्या में लग गईं जो स्वयं मूर्ति विरोधी थे .. उन्होने केश तक निकाल दिये लेकिन आज बुद्ध को घुंघराले लटों के साथ पूज रहे हैं हम लोग । बुद्ध में सनातन धर्म का सत्य है ।(बुद्ध जो स्वयं राजा थे उन्हे  दलितों   का  भगवान बना दिया गया और इसे सनातन धर्म से अलग करके बौद्ध धर्म बना दिया गया जिसके बाद से सनातन धर्म की वर्ण संरचना टूट गई और सनातन का सत्य अलग हो गया ) 
                                           जियो और जीने दो.... अहिंसा परमोधर्महः का उपदेश जैन समाज का मूल सिध्दांत है औऱ यही एक ऐसा समाज जो आज भी अपने सदगुरूओं की शिक्षा पर अमल कर रहा है किंतु कुछ संशोधन के साथ .. मसलन भारत में इसी समाज से जुडकर कुछ लोगों नें ब्याज का धंधा अपना लिये जो की मूलतः हर समाज में एक बुराई के रूप में देखा जाता है , महानवीर नें अपनें वस्त्रों का त्याग कर दिये किंतु आज सबसे ज्यादा कपडे की दुकान इसी समाज के लोगों द्वारा संचालित है । इस समाज में जारी धर्म हनन लगातार बढते जा रहा है जिससे ना केवल जैन समाज बल्कि हिंदु धर्म की भी क्षति हो रही है । महावीर में सनातन धर्म का ज्ञान और मूल सिद्धांत  है और लुप्त हो चुका तंत्र है। (जैन समाज को आरक्षण की आड में इसे सनातन धर्म से अलग करके जैन धर्म बना दिया गया और किसी जैनी को यह पुछने की नही सुझी की जब हमारे समाज से सनातन धर्म को ज्ञान और अहिंसा मिलती है तो हम इससे अलग कैसे हुए) 
                                            कुछ उद्यम किजे .....कबीर नें अपना पूरा जीवन सूत कातते हुए लोगों को परमात्मा से मिलने की विधी बताए । इसमें सूत कातने का अर्थ यह नही की वे केवल जुलाहे थे दरअसल उन्होने दुनिया को संदेश दिये की मानव योनि में रहते हुए हमें अपने कर्म करना उतना ही आवश्यक है जितना परमात्मा को पाने का प्रयास करना कोई कहते हैं कबीर मुसलमान थे तो कोई उन्हे हिंदु बताने में कोई कसर बाकी नही रखे । मेरे विचार में कबीर सनातन धर्म के ही हैं और जब मुस्लिम शासकों नें इनकी लोकप्रियता देखे तो इन्हे मुसलमान बनाने का भरसक प्रयास किये मुस्लिम तंत्रों का प्रहार किया गया किंतु कबीर अपने गुरू स्वामी रामानंद का नाम लेते हुए हर कठिनाई को पार कर गये । उस दौर में जबकि मुगल जबरदस्ती हिंदुओं का धर्मपरिवर्तन कर रहे थे किसी मुस्लिम का हिंदु बनना वो कैसे बरदाश्त करते इसलिये यह तर्क मुझे नही जमा । कबीर नें लोगों को ज्ञान दिये सिद्धियों के दर्शन करवाए जहां तक हो सका वहां तक जनकल्याण किये किंतु अपनी कुटिया छोडकर कभी बाहर नही निकले वे अनवरत अपने करघे से सूत कात कर अपने परिवार का लालन पालन करते रहे ।  उन्होंने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से भाखे और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। कबीर समस्त विचारों में रामनाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, ईद, मसजिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे। जब आप सदगुरू के पास जाते हैं तो सदगुरू आपके भीतर तक झांकते हैं और परखते हैं की यह कहां तक जा सकता है फिर उसे उतना ही देते हैं जितने का वह योग्य होता है । कबीर सनातन धर्म के कर्म प्रधान संस्कृति को लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किये थे किंतु उसे एक अलग कबीर पंथ बनाकर सनातन धर्म से तोड दिया गया । (सनातन धर्म के एक सदगुरू जिनसे कर्म प्रकट हुआ उन्हे ही अलग कर दिये जिससे सनातन धर्म का कर्मवादी सिद्धांत टूट गया )
                                             ईश्वर एक है ...नानक देव को बचपन से ही सारी विद्याएं व सिद्धियां प्राप्त थी वे एक ऐसे सदगुरू हुए जिन्होने लोगों को एक ईश्वरवाद का सही तरीके से जीने का सिद्धांत बतलाए किंतु इन्हे भी अन्य समाज की तरह सही तरह से नही समझा जा सका । इसका नतीजा ये निकला की गुरू नानक नें सिक्ख समाज को जो दस नियम दिये उसे उन्होने दस गुरूओं में विभक्त कर दिये । सिक्ख समाज के द्वारा जो गुरूवाणी मिली वह अद्भूत एवं अलौकिक है । अतिम गुरू गोबिंद सिंह नें खालसा पंथ की स्थापना इसलिये किये ताकी मुगलों को मार कर भगा दिया जाए और हिंदु धर्म की रक्षा हो सके । उन्होनें अहिंसा पथ छोडते हुए खालसाओ को सूवर का मांस खाने को कहा ताकि मुसलमान इनसे दूर रहें और गौमाता की रक्षा की जा सके । गुरू गोविंद सिंह एक ऐसे सदगुरू हुए जिसने केवल  सनातन धर्म की रक्षा के लिये, अपनी भारत भूमि की मर्यादा बचाने के लिये 14 बार युद्ध करके यह संदेश दिये की केवल धर्म को पढने से कुछ नही होगा यदि रक्षा करनी है तो हथियार उठाना होगा । सिक्ख धर्म सनातन धर्म की ऐसी शाखा है जिसमें देशभक्ति, धर्म, कर्म और युद्ध कला सब कुछ समाहित है । लेकिन अफसोस गुरू गोबिंद सिंह नें जिस देश और धर्म की रक्षा के लिये सब कुछ कुर्बान कर दिये वही खालसा अब अपने लिये अलग देश और अलग धर्म मांग रहा है । सिक्ख धर्म नें नानक देव और अपने गुरूओं के एक ईश्वर के सिद्धांत को छोडकर ग्रंथ साहिब को पूजने लगे किंतु उसके नियमों का पालन भूल गये । वे भूल गये उस निराकार एकाकर राम को जिसकी बातें उनके दसों गुरू बतलाते आए थे । ( सिक्ख समाज को आरक्षण औऱ आतंकवाद की आड में इसे सनातन धर्म से अलग करके अलग धर्म बना दिया गया  जिससे सनातन धर्म की रक्षा पंक्ति टूट गई और वह असहाय हो गया )
                                              सबका मालिक एक --- सांई बाबा के दर्शन करने सभी जाते हैं किंतु जब तक वे जीवित रहे उनका विरोध होता रहा । कभी मंदिर तो कभी मस्जिद की आड में । सांई बाबा यदि चमत्कार में नही फंसते तो देश का बहुत कुछ भला हो सकता था किंतु अफसोस उन्हे केवल चमत्कारी पुरूष के रूप में ही पूजा गया उन्हे केवल अफनी मानता पूरी करने का साधन बना दिया गया और इस तरह से एक सदगुरू का करूण अंत हो गया और मानव नें अपनी भौतिक इच्छा के आगे इस संत से कुछ नही मांगा । (अभई तक तो सांई बाबा सबके हैं देखिये किस दिन इन्हे अलग पंथ बनाकर बांटा जाता है ।
                                             सभी जातियां एक हों ...आज मैं जिनकी प्रेरणा से यह सब लिख पा रहा हूँ वह हैं मेरे पिता स्वरूप सदगुरू स्वामी कृष्णायन जी महाराज उन्होने कुछ बातें सूक्ष्म में रहते हुए बताये कुछ पुस्तकों में लिखे और कुछ श्रीमुख से सुना था जिन्हे लिख रहा हूँ । सदगुरूदेव नें वर्तमान में सदविप्र समाज की स्थापना किये हैं जिसमें सभी जातियों के लोग जुडे हुए हैं । उसमें ब्राह्मण हैं,  क्षत्रीय हैं वैश्य हैं और शुद्र भी हैं । कहने का तात्पर्य यह है की एक ऐसा समाज जिसमें सनातन धर्म के मूल सिद्धांतो के साथ जुडना है । सदगुरूदेव की हर बात प्रमाण के साथ है यदि वे कहते हैं की सनातन धर्म में भगवानों से ऊपर परमात्मा हैं तो वह इसे साधनाओं  के जरिये दिखलाते भी हैं । वे हमारे भीतर विराजित देवताओं के दर्शन कराते हैं हमें बताते हैं की सनातन धर्म के मूल उद्येश्यों को जानों । देश की रक्षा करो, देश होगा तभी धर्म बचेगा और बिना धर्म के कैसी जातियां और कहां के पंथ । 
                                               फर्ज किजिये आज किसी परिस्थिति में देश गुलाम हो जाता है तो क्या वह देश या व्यक्ति हम पर राज करेंगे वह हमें हमारे धर्म को मानने देंगे । आज पूरी दुनिया में एक भी   हिंदु राष्ट्र नही बचा है । हमारा भारत देश भी दुसरे धर्मों के बोझ तले दबता जा रहा है । आतंकियों को हम खाना खिला रहे हैं  और अपने साधु संतों और साध्वीयों को कारागार में प्रताडना दे रहे हैं । इन बातों को किसी भी तरह से सनातन धर्म के सम्मान की बात नही कहा जा सकता । यह कहां का न्याय है की जिन आतंकियों को पकडने के लिये हमारे पुलिस और सेना के तमाम जवान शहिद हो जाते हैं उन्हे पाला जाता है और किसी नेता के अपहरण के बदले में ससम्मान छोड भी दिया जाता है । 
                      यदि आप अपने देश को नही बदल सकते तो जय श्री राम , राधे राधे, उद्यम की बातें, ईशअवर एक है का सिद्धांत, अपनी अहिंसा और सत्य की बातें ... सब कुछ पकडे रहो और जिस दिन विदेशी धर्म तुम्हे कुचल दें उसके बाद या तो उनके गुणगान करना या फिर चुपचाप   अपनी औरतों और बच्चीयों को उनके धर्म को बढाने के लिये सौंप देना क्योंकी तुम्हे कोई हक नही है अपना नपुंसक वंश बढाने का  ।    इसलिये हे महान देश के लोगों भगवान को पूजना बंद करो और अपने कर्मो को सुधारो ।