Sunday, April 29, 2012

रामायण छोड, भागवत क्यों बांचे ।

आज हमारे देश की दयनीय हालत के जवाबदेह सरकार को माना जा रहा है । लोग पानी पी पी के सरकार को कोस रहे हैं लेकिन खुद क्या कर रहे हैं उन्हे स्वयं नही मालूम .. भ्रष्टाचार को कोसने वाले मौका मिलने पर खुद भ्रष्टाचारी बन जाते हैं और दलील बडी प्यारी सी देते हैं ...क्या करें भइय़ा जब सब खा रहे हैं तो हम क्या करें कहां तक बचें..... 
             चलो बात थी भष्टाचार की अब बात करते हैं अपने प्रिय विषय की.... सबसे पहले स्पष्ट कर दूं की इस लेख को वह कदापि ना पढे जिसमें सोचने समझने की क्षमता हो .. यह लेख मैं अपने बगल में श्रीमद् भागवत कथा (प्रथम खण्ड) गीता प्रेस द्वारा मुद्रित को रखा हुआ हूँ और इसे पढने के बाद ही कुछ लिखने जा रहा हूँ । 
               इससे पहले एक कथा जो हमने गत वर्ष बद्रीधाम में अपने सदगुरूदेव श्री कृष्णायनजी महाराज के श्रीमुख से सुने थे वह बता रहा हूँ - 
          एक बार किसी गांव में एक कथावाचक रामायण की कथा सुनाने के लिये पहुंचा । कथा सुनाने के पहले कथावाचक नें श्रीराम चंद्र और हनुमान जी का आवाहन कथा सुनने के लिये तो हनुमान जी जो संयोग से वहा से गुजर रहे थे कथा सनने के लिये रूक गये । कथा वाचक उस दिन हनुमान के लंका प्रवेश की कथा सुना रहा था, उसने कहना शुरू किया और बताने लगा की हनुमान जी जब अशोक के वृक्ष पर बैठे तो सारा वृक्ष सफेद सफेद फुलों से भरा हुआ था ... इस बात पर हनुमान जी नें टोक दिये की हे कथाकार  अशोक के वृक्ष पर सफेद नही लाल फूल थे ..,..,
                                       इतना सुनना था की कथावाचक भडक कर कहने लगा तुम कौन हो जो कथा के बीच में टोका टाकी कर रहे हो .. 
हनुमान जी नें कहे कथावाचक मैं हनुमान हूँ और जब मैं स्वयं अशोक के वृक्ष पर बैठा था तो उसमें लाल फूल लगे हुए थे । अब कथा वाचक अपने तर्क देने लगा जब हनुमान जी अपनी बात पर अडिग रहे तो कथावाचक नें कहा - अच्छा अगर तुम हनुमान हो तो बताओ तुमने वृक्ष पर बैठ कर फूलो के अलावा नीचे क्या देखा । 
हनुमानजी बोले - नीचे सीतामाता राक्षसियो से घिरी हुई थी । 
कथावाचक - सीतामाता को देखकर तुम्हारे मन में क्या हुआ प्रेम आया या क्रोध । 
हनुमान- माता को उस हालत में देखकर मुझे बहुत क्रोध आया । 
कथावाचक - बस हनुमान मैं यही सुनना चाहता था , दरअसल मैं सही हूँ किंतु तुम भी गलत नही हो दरअसल अशोक के वृक्ष पर फूल तो सफेद थे किंतु तुम्हारी आँखे के आगे क्रोध के कारण लालिमा उतर गई थी और तुम्हे सफेद फूल लाल दिखलाई पड रहे थे ।
                                           यह सुनकर हनुमान निरूत्तर हो गये किंतु अपनी बात को मनाने के लिये फिर भी कथा वाचक से तर्क देते रहे अंत में खीज कर कथा वाचक नें कहा की देखो अगर तुम हनुमान हो तो अपना कोई गवाह लेकर आओ जो तुम्हारी बात की सत्यता का प्रमाण दे सके । अब हनुमान जी बोले की ठीक है मैं कल अपने गवाह को लेकर आऊंगा ।
                                               अब हनुमान जी सीधे पहुंचे श्रीराम के पास और कहने लगे की हे प्रभु आप मेरे साथ कल पृथ्वीलोक पर चलियेगा । 
राम बोले क्यों क्या हुआ हनुमान ।
 हनुमानजी - प्रभु एक दुष्ट कथावाचक है जो गलत सलत रामायण लोगों को सुना रहा है । 
श्रीराम -  तुम काहे वहां रूक गये हनुमान वह कथावाचक हैं उनका काम है कथा बांचकर अपना पेट भरना तुम भी फालतुन के काम में लग जाते हो । 
हनुमान - प्रभु उसने मेरा आव्हान किया था रामायण सुनने के लिये इसलिये चला गया ।
 श्रीराम - अरे छोडो भी हनुमान उन्हे अपना काम करने दो तुम भी अपना काम करो हमें भी ध्यान करने दो ।                                                                   किंतु हनुमान इतनी आसानी से कहां पीछा छोडने वाले थे । अंततः दुसरे दिन श्रीराम हनुमान के साथ कथावाचक के सामने पहुंचे ।
हनुमानजी- कथावाचक .. लो मै अपना गवाह ले आया हूँ जो मेरी बात को सत्यता का प्रमाण देंगे ।
कथावाचक - ओह तुम फिर आ गये .. कौन है ये तु्म्हारा गवाह ।
हनुमान- ये हैं प्रभु श्रीराम ।
कथावाचक - अच्छा तो बताओ श्रीरामचंद्रजी आपने अशोक के वृक्ष पर कौन से रंग का फूल देखे थे ।
श्रीरामचंद्र - लाल रंग के .. हां कथावाचक अशोक के वृक्ष पर लाल फूल लदे हुए थे ।
कथावाचक - ओह अच्छा अगर तुम राम तो बताओजब तुम उस वृक्ष के पास पहुंचे तो तुम्हारे मन में क्या भाव थे । तुम अपने भीतर क्या महसूस कर रहे थे ।
श्रीराम - मैं यह सोच रहा था की इस वृक्ष के नीचे सीता नें किस तरह से इतना लंबा समय व्यतीत की होंगी .।
कथावाचक - और उस सोच में तुम्हारे निर्मल मन की करूणा अश्रुरूप में निर्झर बह रही थी ... सही है ना राम ।
श्रीराम - हां कथावाचक यह सही है ।
कथावाचक- सुनो हनुमान तुम्हे अशोक के फूल लाल इसलिये दिखलाई पडे क्योंकी तुम्हारे मन का क्रोध आँको में उतर चुका था और तुम्हारे गवाह श्रीराम के अश्रुपूरित नयन जो रोते रोते लाल हो गये थे इस कारण से उन्हे लाल दिखलाई पडे . . । और सुनो हनुमान अगर तुम दुबारा फिर किसी कथा वाचक से वादविवाद करोगे तो मैं रामायण छोडकर भागवत पढाना शुरू कर दूंगा ।
                               
                                इस कथा के अंत में जो बात उस कथा वाचक नें कही वह बात आज सारे देश में लागू हो गई है । जब तक रामायण पाठ होते थे श्रीराम नाम के जाप से देश में सुक शांति का वास रहता था और आज जब भागवत शुरू हो गई है तो देश का हाल कितना बुरा हो रहा है हम सब देख रहे हैं । दरअसल हम जो भी कथा कहानी सुनते हैं उससे हमारी भावनाएं, हमारा अवचेतन मन आसपास के वातावरम में फैल जाता है और जिस तरह का वातावरण फैलता है देश की मनोस्थिति वैसी ही होती जाती है ।
                               हमारा देश ना केवल राजनितीक बल्कि धार्मिक रूप से भी पतन मार्ग की ओर अघ्रसर है । आप स्वयं जो भागवत पुराण को पढ सकते हैं पडकर देखियेगा की उसमें ऐसी क्या बात है या ऐसी कौन सी सीख हमें मिलती है जिससे हम देश या स्वयं को बदल सकते हैं । देश के सारे कथावाचक अपने को धर्मगुरू समझने लगे हैं और हमारी देश की जनता उन्हे गुरू बना रही है जिनका काम केवल कथापढना है यानि लिखे हुए को पढना है । उनसे ज्ञान नही मिलता बल्की उल्टे हमारा समय और पैसा बर्बाद हो जाता है । ये कथआवाचक अपने शिष्यों की संख्या बढाने में मशगुल रहते हैं .. मेरे इतने शिष्य तो मेरे इतने शिष्य.... लेकिन शिष्यों को क्या सीख दे रहे हैं ये धर्म गुरू । स्वयं भ्रष्ट हैं, लगभग हर भागवत कथावाचकों की दो दो स्त्रीयां है अपने स्वार्थ के आगे देश को छोटा कर देते हैं कभी पुलिस अधिकारी को धमकाते हैं तो कभी पत्रकार को चांटा जड देते हैं । ऐसे कथावाचक जो देश का सम्मान नही कर सकते वे अपने शिष्यों को देश का कौन सा हित सिखला रहे हैं यह उन शिष्यों को भी नही मालूम । 
                                  कई तो ऐसे हैं जो किसी पति पत्नि   को दीक्षा देकर कहते हैं की आज से तुम लोग गुरू भाई बहन हो  अपने सांसारिक मोह का त्याग करो और भाई बहनों की तरह रहो .... धन्य हैं रिश्तों को तार तार करते ये महान धर्मगुरू ।